આ બ્લોગમાં મારું લખેલું સાહિત્ય છે. સાહિત્ય માનવ જીવન અને માનવના સ્વભાવના હકારાત્મક વિકાસ માટે બહુ જરૂરી છે. એમાં મારું સાહિત્ય જો ફૂલ નહીં ફૂલની પાંખડી જેટલું કાર્ય કરી શકશે, તો મારું જીવન સાર્થક થયી જશે.
રવિવાર, 5 ફેબ્રુઆરી, 2012
तन्हाई
आँख से टपकनेवाले मोतीयों,
पर बेवफा का नाम लिखा है
मैने सारी तन्हाईयां अपनी
कुएँ सी आँखोँ के नाम लिखी है
कुमार अहमदाबादी
नजर
कत्ल कर नजरों के तीर से, हम; यही चाहते हैं।
सुन ले पर, मर के जीने का अंदाज; हम जानते हैं।
कुमार अमदावादी
ચર્મ બાણ
થોડી તું પીંખાઈ જા
મારા માં સમાઈ જા
નાજુક ચર્મ બાણથી
ગોરી તું વીંધાઇ જા
અભણ અમદાવાદી
सिंगार की पुकार
सजनी ऊफ़! ये तेरा सोलह सिंगार
ये चमकता कजरा ये नैन कटार
ये रसीले अधर ये पीयूषी नजर
ये सतरंगी स्वप्नीला आँचल
लरजती साँस थिरकती धडकन
पुकार रहे हैं प्रीतम को सजन को
कह रहे हैं लूट लो चितवन को
छेड़ो एसे जैसे मैं बाँसुरी हूँ
प्यास से लबालब अंगूरी हूँ
अतृप्त अभिसारिका, मयूरी हूँ
सिंगार को कलात्मकता से
नजाकत से नफ़ासत से
मधुरता से कोमलता से
सुरीली लयात्मकता से मिटा दो।
कुमार एहमदाबादी
સોમવાર, 30 જાન્યુઆરી, 2012
प्रणय पंख
कट गये प्रणय पंख हमारे
स्व- भूलोँ की तलवार से
किस को सुनायेँ प्रेम कहानी
किस ने आँसुओँ की भाषा जानी
कुमार अमदावादी
Prerna Sharma
.." कलि - कुसुम से पथ सजा दूं ,
कंटकों को मैं बुहार दूं ,
अब आ भी जा प्रिय तू ,
तेरी राह में आँखें बिछा दूं ...!!" ----
... प्रेरणा --- ३ जनवरी २०१२
Mahesh Soni
कलि कुसुम से सजे पथ पर न चल सकता हूँ।
आँखे बिछी हो उस पर कैसे मैं चल सकता हूँ!
फूल भी मत बिछाओ मेरी वापसी के पथ पर;
कोमलता को कुचलते हुए मैं न लौट सकता हूँ॥
कुमार अमदावादी
चाशनी
प्यार की चाशनी पीये बिन कवि ना बन सकोगे।
घाव को शब्द में घोले बिन कवि ना बन सकोगे॥
कुमार अमदावादी
પ્યાર કી ચાસની પીયે બિન કવિ ના બન સકોગે.
ઘાવ કો શબ્દ મેં ઘોલે બિન કવિ ના બન સકોગે.
કુમાર અમદાવાદી
चोट
चोट को रोज निखारता रहा
पीर को शब्दोँ में ढालता रहा
बारहा आँधी तूफान आए पर
काव्य के पौधे को पालता रहा
खुशीयाँ तो बाँट लूँगा
पर गम न बाँट सकूँगा
रुलाना मेरा काम नहीं
आप को न रुला सकूँगा
कुमार अमदावादी
ચૂલા પર તપેલી છે
ચલક ચલાણું
पीर को शब्दोँ में ढालता रहा
बारहा आँधी तूफान आए पर
काव्य के पौधे को पालता रहा
खुशीयाँ तो बाँट लूँगा
पर गम न बाँट सकूँगा
रुलाना मेरा काम नहीं
आप को न रुला सकूँगा
कुमार अमदावादी
ચૂલા પર તપેલી છે
તપેલીમાં ચમેલી છે
તપેલીમાં ઉકળીને
નિખરી રહી ચમેલી છ
ચલક ચલાણું
પાંચ પતિઓ વચ્ચે વહેંચાઈ
સ્ત્રી છું કે હું ચલક ચલાણું છું
અભણ અમદાવાદી
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