ગુરુવાર, 22 સપ્ટેમ્બર, 2011

તિરાડ

               
ભીંત માં તિરાડ જોઈ સૂર્ય રાજી થઇ ગયો.

સૌની નજરોની સમક્ષ કિરણને અંદર લઇ ગયો.

બંધ રોકે પાણીને, ના પૂરને રોકી શકે,

મંત્ર આ સંઘર્ષને હંમેશા ટોચે લઇ ગયો.

રોટલી દાઝી, ઉપરનું પડ ઉતારી દે,

કોળિયો ઉદરનો ખાડો ભરવા લાયક થઇ ગયો?

અભણ અમદાવાદી

परिवर्तन

परिवर्तन की ठानो और गंगा नई बहा दो अब।
पुराने ग्यान वाद्यों पर नई सरगम रचा दो अब॥
न, ग्रंथो को जलाने से परिवर्तन नहीं होता।
सृजन की सोच से होता ये, क्रान्ति को बता दो अब।।
दो अफसर थक चुके, हैं मूल विपदाओं के।
नए सूरज नए चंदा को, ड्यूटी पे लगा दो अब॥
जवानी का ये है कर्त्तव्य, कि इतिहास वो लिखे।
गगन से ऊँची जाये उन, पतंगों को हवा दो अब॥
खज़ाना खोल देगा सामने तुम्हारे इक पल में।
भईया मन को कम्पूटर को, थोडा सा लगा दो अब॥
निराशा क्यों; जमीं बंज़र है? मेहनत के धनी किसान।
पसीने से करो उपजाऊ, श्रम का हल चला दो अब॥
सदियों से समस्याओं का कारण जो बने हैं वे।
कराये बैर जो लोगों में, ढांचे वे ढहा दो अब॥

ખોળું છું

સદીયો થી હું ખોળું છું
સતયુગ ને હું શોધું છું
નામ છે આદર્શ મારુ
શમણાંનું ઘર શોધું છું

बात ये यकीनी है

कडवी पर बात ये यकीनी है।
भाग्यरेखा बड़ी कमीनी है॥

थाली कैसी परोसी है रब ने!?
रोटी है ना नमक, न चीनी है॥

नीतियाँ कैसी हो रही निर्मीत।
सब हवा में, न कुछ जमीनी है॥

माली के कंधे, फूल की अर्थी:
आँसु सूखे हैं; आँख भीनी है॥

प्यास ऐसी लगी है; साबर जो,
चित्र में है : हमें वो पानी है॥

हावी है हम बनानेवाले पर।
जिन्दगी हम सी है; मशीनी है॥

कब बिखर जाए, तार नाजुक है।
मान ईज्जत की शाल, झीनी है॥

माँ का घर

माँ का घर छूटा है जब से।
जग सारा रुठा है मुज से।
        घर क्या छूटा दुनिया छूटी।
        सुख दुख और खुशीयाँ रुठी।
                सच कहता हूँ मैं ये माता।
                रुठ गया है मुज से विधाता।
                          माँ .... मे........री माँ
                           माँ.... तू... है कहाँ
बाग रूठा, माली  रूठा, गुलशन  के  सब  फ़ूल रूठे
अपने  रूठे, बेगाने  भी, रूठ  गए  है  अनजाने  भी..माँ 

सूरज रूठा, चन्दा रूठा, नभ  के  सारे तारे रूठे,
धरती  रूठी, आसमाँ भी, रूठ गया है वो खुदा भी...माँ 

संध्या रूठी, उषा रूठी, घडी के सारे कांटे रूठे,   
रात रूठी, दोपहर भी, रूठ गई है देखो हवा भी,.......माँ
आग रूठी, पानी रूठा, साराजीवन-चक्र रूठा
मौत रूठी, जिंदगी भी,रूठ गई है  बंदगी भी .. .......माँ

બુધવાર, 24 ઑગસ્ટ, 2011

લાજ શરમ

અન્નાએ સરકારને ભેખડે ભરાવી
કેન્દ્રની સરકારે મર્યાદાને લજાવી


મૂંઝવણ
અન્ના એ સરકાર ને મૂંઝવણમાં મૂકી
બળતી મશાલ અંધારા રણમાં મૂકી


અન્ના-ને સમર્પણ
અન્ના એ અન્ન ને ના પાડી
સરકારની ધીરજ ખૂટાડી


શ્વાસે શ્વાસે, દડમજલ છે, જિંદગીમાં હંમેશા,
જોઈ લેજો, બસ હરણને, વાઘથી જે બચે છે.
અભણ અમદાવાદી

ચૂર છે ચકચૂર છે.
ઘેન બહુ મગરુર છે.

થા ન ઊતાવળો,
દિલ્લી બહુ દૂર છે.
...
ઘાવ પર ઘાવ દે,
કાંટો આ ક્રૂર છે.

દેશ માટે મળે,
મોત મંજૂર છે

સોમવાર, 15 ઑગસ્ટ, 2011

आरक्षण

  
आरक्षण एक नए प्रकार की जाति प्रथा नहीं है तो क्या है? जाति प्रथा क्या थी? एक जाति का व्यक्ति दूसरी जाति का व्यवसाय नहीं कर सकता था, दूसरी जाति में शादी नहीं कर सकता था. क्या वो सब एक प्रकार का आरक्षण नहीं था?बतलाये मुज को,